Monday, November 29, 2010

पेड न्यूज़ मामला

पेड न्यूज़ मामला: भारतीय प्रेस परिषद ने सिफारिशें चुनाव आयोग सौंपी  

भारतीय प्रेस परिषद ने चुनावों के दौरान पैसा लेकर समाचार प्रकाशित और प्रसारित करने तथा धन के दुरुपयोग संबंधी अपनी सिफारिशें चुनाव आयोग को सौंप दी है।

विधि एवं न्याय मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने ईश्वर सिंह के सवालों के लिखित जवाब में सोमवार को राज्यसभा को यह जानकारी दी। मोइली ने कहा कि आयोग ने चुनावों के दौरान पेड न्यूज के मामलों पर नजर रखने के लिए जिला स्तरीय समिति बनाने के लिए मुख्य निर्वाचक अधिकारियों को निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि आयोग ने चुनावों के दौरान धन शक्ति के दुरुपयोग और पेड न्यूज की समस्या को मानिटर करने के लिए अलग प्रभाग बनाने का भी फैसला किया है।

Monday, November 22, 2010

दिल्ली दिलवालों की नहीं मनचलों की हो गई|

नई दिल्ली॥ दिल्ली अब दिलवालों की नहीं बल्कि मनचलों की हो गई है। एक सर्वे के अनुसार दिल्ली में महिलाओ और लड़कियों के साथ छेड़खानी के सबसे अधिक मामले होते हैं। गुल पनाग को इस सर्वे का प्रत्यक्ष सामना करना पड़ा। गुल पनाग दिल्ली में हॉफ मैराथन में हिस्सा लेने आईं थी।

हॉफ मैराथन में हिस्सा लेने आई बॉलीवुड अदाकारा गुल पनाग के साथ दिल्ली में छेड़खानी हुई। उनके मुताबिक उन्हें हॉफ मैराथन के दौरान कुछ लोगों ने बार-बार छूना चाहा और छेड़ने के इरादे से बार-बार छूते रहे। गुल पनाग ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में बताया कि 6-7 बार लोगों ने टच किया। गुल पनाग ने कहा कि वह तो दिल्ली की है और हालांकि अब वो मुंबई में रहती है,उन्हें अंदाजा था कि दिल्ली अब सुधर गई होगी लेकिन दिल्ली में अब भी महिलाएं असुरक्षित है।

गुल पनाग ने कहा कि कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद दिल्ली काफी हद तक बदल गई है, लेकिन पुरूषों की एक आदत नहीं बदली है, वह है लड़कियों को छेड़ने की। गुल पनाग के मुताबिक दिल्ली में लोग लड़कियों को छेड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ते इसलिए  दिल्ली लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है।

गुल पनाग को तो दिल्ली के पुरुष नहीं भाते लेकिन उन्हें राजधानी दिल्ली की सड़कें और सफाई खूब भाती है जिसकी उन्होंने जमकर तारीफ की ।


Wednesday, November 17, 2010

इमारत हादसा: वो मलबे के नीचे से फोन करते रहे बेटा ‘मुझे बचा लो’


दूसरों की गलती से अपनों को मौत के मुंह में जाते देखने की बेबसी क्या होती है ये विक्रम से बेहतर कोई नहीं जानता। विक्रम के पिता ने अपने दोस्त के मोबाइल से हादसे वाली रात एक बजे फोन किया कि हम मलबे के नीचे दबे हैं, हम किसी चीज के नीचे हैं हमे बचा लो।
अपने पिता के शब्द सुनकर विक्रम के हाथ पांव फूल गए, लेकिन वो कुछ कर नही सकता था। मलबे में तब्दील हुई पांच मंजिले सबके सामने थी लेकिन उसमे उस आवाज का पता लगाना बेहद मुश्किल था जो जिंदगी मांग रही थी। उसने पुलिस से अपने पिता को जल्द से जल्द निकालने की गुहार की इतने में ही पता चला कि राम मनोहर लोहिया में उसकी घायल बहन की मौत हो गई।

इसके बाद चाचा, चाची. और उनके दो बच्चों की भी मौत की खबर आई। मंगलवार शाम 4 बजे तक विक्रम को पिता की खबर नहीं मिली, जिस न0 से फोन आया था अब वो भी लगातार इंगेज जाने लगा शाम 6 बजे आखिरकार उसकी एक पीड़ा का अंत हो गया कि उसके पिता तड़प रहे हैं लेकिन उनकी मौत की पीड़ा का दर्द अब ये परिवार पूरी उम्र सहेगा।



अपनी निशानी छोड़ जा... 
दो दिन पहले हुए इमारत हादसे में ये कुछ चीजे मिली जिन्हे कभी इस घर में रहने वाले लोगों ने जी जान से सहेजा होगा। ये कॉपी मुकेश कुमार की है। मुकेश कुमार हमेशा 12 वीं का छात्र रहेगा, इन फोटो में दिखने वाले बदनसीबों को अब कभी इन विजिटिंग कार्डों पर लिखे न0 की जरूरत नही होगी, ग्लोब में खड़ी आकृती शाश्वत रूप से ऐसे ही प्रेम से एक दूसरे को देखती रहेंगी। लेकिन इन सबको संजोने वाले अब इस दुनिया में नही हैं।

 
ऐसी न जाने कितनी निशानियां और कहानियां इस मलबे के ढेर के नीचे दम तोड़ चुकी होंगी।
इन जिंदगियों को कहानी बनाने में एक बिल्डर का हाथ नहीं है इसके लिए सरकारी मशीनरी में व्याप्त भ्रष्टाचार भी जिम्मेदार है।