Monday, May 2, 2011

प्रकाशकों के साथ धोखाः PAC बैठक से पूर्व कुछ अखबार पैनलबद्ध


अगस्त 2010 में पैनलबद्ध होने के लिए आवेदित अखबारों के चयन पर विचार करने के लिए बनी पीएसी की बैठक से पूर्व ही कुछ अखबारों को पैनलबद्ध कर लिया गया है। डीएवीपी में अगस्त 2010 में आवेदित अखबारों को पैनलबद्ध करने के लिए पीएसी की इस बैठक को नवंबर 2010 में होना चाहिए था, लेकिन बिना कारण बताए इस बैठक को मई तक घसीटा गया। जबकि अंदरखाने अगस्त 2010 में आवेदित कुछ अखबारों को पीएसी बैठक से पहले ही पैनलबद्ध कर लिया गया।

empaneled newspaperप्रकाशकों के साथ इससे बड़ा धोखा और क्या हो सकता है कि पहले तो उनसे फरवरी 2011 में पुनः आवेदन का मौका छीना गया और दूसरे वो भ्रम की स्थिति में अभी भी इंतजार में हैं कि जब पीएसी की बैठक होगी तो पूरी पारदर्शिता से अखबारों के पैनलबद्ध होने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

यद्यपि महानिदेशक डीएवीपी को विज्ञापन नीति 2007 के अनुसार अधिकार है कि वो पीएसी की बैठक से पूर्व अपने विवेकाधिकार से अखबारों को पैनलबद्ध कर सकता है। परंतु वह उन्ही अखबारों को पैनलबद्ध कर सकता है जिन अखबारों ने पैनलबद्ध होने के लिए डीएवीपी द्वारा निर्धारित सभी मानदण्डों और प्रक्रियाओं को पूरा किया हो। परंतु अगस्त 2010 में आवेदित पीएसी की बैठक से पूर्व जिन अखबारों को पैनलबद्ध किया गया है उनमें कुछ ऐसे अखबार भी शामिल हैं जिन्होंने इन मानदण्डों को पूरा नहीं किया है।

इन अखबारों को पैनलबद्ध करने के लिए महानिदेशक डीएवीपी ने अपने विवेकाधिकार का बेजा इस्तेमाल किया व लघु एवम क्षेत्रिय अखबारों के साथ दोहरा रवैया अपनाया। बड़ा सवाल यह है कि केवल इन्ही अखबारों को पैनलबद्ध करने में इतनी जल्दी क्यों दिखाई गई, यदि इसके पीछे यह कारण था कि पीएसी की बैठक में देरी हो रही थी तब क्यों नहीं सभी अखबारों पर विचार किया गया।
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डीएवीपी की मनमानी का आलम यह है कि कोई प्रकाशक उनसे सवाल नहीं कर सकता। हिन्दुस्तान के संविधान के मुताबिक एक बार नाइंसाफी होने पर न्याय पाने के लिए न्याय ना मिलने तक अपील करने का अधिकार है, परंतु डीएवीपी में हुए अन्याय को प्रकाशक अंतिम फैसला मानने को बाध्य है।

अगस्त 2010 में देश के दूर दराज इलाकों से आकर पैनलबद्ध होने के लिए प्रकाशक ईमानदारी से कतार लगाए खड़े रह गए और कतार तोड़ कर कुछ अखबारों को पैनलबद्ध कर लिया गया।

डीएवीपी बार बार यह दावा करता है कि वह पारदर्शिता के लिए प्रतिबद्ध है, यदि किसी प्रकाशक को डीएवीपी से कोई समस्या है तो वो सीधे डीजी और एडीजी से बात कर सकता है। जबकि असलियत यह है कि एक बार किसी अखबार के रिजेक्ट होने पर प्रकाशक अपने पक्ष में लाख तर्क रखे, डीएवीपी का एक ही जवाब होता है अब कुछ नहीं हो सकता अगली बार आवेदन करें। अंत तक डीएवीपी इस ’गलत रिजेक्शन’ के लिए खुद को जिम्मेदार मानने को तैयार नहीं होता, और ना ही उन पर पुर्नविचार करता है। कई प्रकाशकों ने ‘लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन’ पास डीएवीपी द्वारा की गई मनमानियों के खिलाफ खबरें भेंजी हैं।

ऐसे ही एक प्रकाशक ने बताया कि उनके अखबार को यह कहते हुए पैनलबद्ध नहीं किया गया कि उन्होने अपने अखबार पर आरएनआई संख्या गलत लिखी है। इस संबंध में प्रकाशक ने महानिदेशक डीएवीपी से बात की लेकिन उसका कोई हल नही निकला। जब प्रकाशक ने सूचना के अधिकार अधिनियम के माध्यम से पूछा कि डीएवीपी किस आरएनआई संख्या को सही मानता है तब उत्तर मिला कि जो आरएनआई द्वारा जारी प्रमाणपत्र पर अंकित हो, तब प्रकाशक पुनः आरटीआई के जवाब और आरएनआई प्रमाणपत्र के साथ महानिदेशक डीएवीपी से मिला। प्रकाशक ने अखबार पर वही आरएनआई संख्या मुद्रित की थी जो आरएनआई प्रमाणपत्र पर अंकित थी। महानिदेशक डीएवीपी ने काफी हिलहुज्जत के बावजूद भी इस समस्या का एक ही समाधान बताया कि ‘अगली बार आवेदन करें’।

हमारे देश में सरकारी विभाग किसी काम को सुचारू करने के लिए काम नहीं करते बल्कि ऐसे गड्ढे बन जाते हैं जहां सब कुछ अटक जाए। डीएवीपी भी इसका अपवाद नहीं है।

दरअसल प्रकाशकों की समस्या से कोई जुड़ना नहीं चाहता। सरकार को भी केवल अपनी नीति के प्रचार प्रसार से मतलब है जिसके लिए वो अखबारों का प्रयोग तो करती है परंतु उसके उत्थान के लिए कुछ नहीं करना चाहती।

अखबारों के पैनलबद्ध ना होने की पीड़ा प्रकाशक की है, प्रकाशक को हर हाल में अखबार चलाना है। उसके लिए उसे डीएवीपी की ओर देखना पड़ता है। उसकी आशा टूटने से ना तो डीएवीपी को फर्क पड़ता है और ना सरकार को कोई दर्द होता है। ये प्रकाशक की अपनी लड़ाई है कि वो जनता की आवाज बने रहने के लिए कब तक संघर्ष कर सकता है।

लेखक श्री सुभाष सिंह लीड इंडिया दैनिक, इनसाइड स्टोरी पाक्षिक और सेंसेक्स टाइम बिजनेस पाक्षिक के प्रकाशक हैं एवं लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। श्री सुभाष सिंह से subhash_singh27@yahoo.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

नोट: हमारा विरोध किसी भी प्रकाशक अथवा अखबार के साथ नहीं है। हमारा विरोध डीएवीपी की गलत नीतियों और सरकारी उदासीनता के साथ है। पीएसी की बैठक से पूर्व पैनलबद्ध किए गए समाचारपत्रों की सूची देना खबर के तथ्यों के लिए अनिवार्य है। लीपा सभी प्रकाशकों को एक समान देखती है, एवं उनके हितों के लिए भी उतनी ही तत्पर है।

Friday, April 1, 2011

डीएवीपी ने ‘विज्ञापन नीति 2007’ का किया उल्लघंन


 पत्रकारिता को जीवित रखने के लिए कोई ठोस सरकारी प्रयास नहीं किए गए। सरकार डीएवीपी बना कर भूल गई है। असल में प्रकाशकों को यदि कोई सरकारी सहायता मिलती है तो वह इसी सरकारी एजेंसी डीएवीपी के माध्यम से मिलती है और यहीं से डीएवीपी के नाख़ुदाओं की प्रकाशकों के ख़ुदा बनने की कहानी शुरू होती है।
नई विज्ञापन नीति 2007 के कड़े प्रावधानों को पूरा करते-करते प्रकाशकों की कमर टूट जाती है। डीएवीपी इम्पैनल्ड होने के बाद डीएवीपी में बने रहने के लिए ’पत्रकारिता’ सिर्फ सरकारी शर्त पूरी करने में लगी रहती है। अखबार मालिक पिछले बिल और अगले बिल के फेर में भटकते नजर आते हैं। जिन्हें विज्ञापन मिलता है उस पर डीएवीपी के बाबुओं का कमीशन फिट है।
ये कमीशन अकेला बाबु नहीं खाता। कमीशन ऊपर तक बंटता है। डीएवीपी के विषय में प्रचलित है कि अगर अपना अखबार इम्पैनल्ड कराना है तो एजेंट के बिना काम नहीं हो सकता। लेकिन यहां तो एजेंट का कॉंसेप्ट भी अलग है। जिस तरह हर सरकारी महकमें के पास दलाल घूमते मिलते हैं आपको यहां ऐसे दलाल नहीं मिलेंगे, क्योंकि प्रचलित शैली के आधार पर इन दलालों की सरकारी महकमों में पैठ होती है ये विभाग में कार्यरत नहीं होते, लेकिन डीएवीपी में ये काम बाहर का एजेंट नहीं करता बल्कि अंदर बैठे बाबु और अधिकारी खुद ही एजेंट की भूमिका निभा रहे हैं।

डीएवीपी के अंदर फैले भ्रष्टाचार से वहां इम्पैनल्ड हर अखबार परिचित है। लेकिन अपने अखबार को हर हाल में चलाने की जीजीविषा की खातिर वो इस विषय पर चुप्पी साधे रखना बेहतर समझता है। क्योंकि बेहद मुश्किलों से मिले इस अवसर को प्रकाशक खोना नहीं चाहता।

हालांकि यह बात अलग है कि सरकारी विज्ञापनों से मिलने वाली ये सहायता ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होती है। पिछले 60 सालों में जहां देश में छटा वेतन आयोग लगने से सरकारी मातहतों की तनख्वाओं में दोगुनी-तिगुनी वृद्धि हुई, जहां देश में बढ़ती मंहगाई ने हर आवश्यक चीज में बेतहाशा वृद्धि की वहीं अखबारों को मिलने वाली सरकारी विज्ञापन दरों में घिसटते हुए कुछ ही प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

डीएवीपी के हालिया कृत्य को अगर ध्यान से देंखें तो पता चलेगा कि डीएवीपी किस कदर प्रकाशकों से बैर भाव रखती है।
कानून के मुताबिक इम्पैनल्ड होने के लिए डीएवीपी समाचार पत्रों से वर्ष में दो बार आवेदन मंगवाती है। एक बार अगस्त में और दूसरा फरवरी में। नई विज्ञापन नीति अक्टूबर 2007 के तहत फरवरी किए गए आवेदनों पर उसी वर्ष के माह में विचार किया जाना चाहिए और विज्ञापन का अनुबंध उसी वर्ष की एक जुलाई से शुरू होना चाहिए तथा अगस्त में किए गए आवेदनों पर नवंबर में विचार किया जाना चाहिए एवं उनका अनुबंध एक जनवरी से शुरू होना चाहिए।
लेकिन नाकारा हो चुकी डीएवीपी ने अगस्त 2010 में पैनलबद्ध करने हेतु मंगाए गए अखबारों पर अभी तक कोई निर्णय नहीं किया है। सच्चाई तो यह है कि डीएवीपी सुनियोजित तरीके से अखबारों से उनका हक छीन रही है। यदि डीएवीपी ने अगस्त 2010 में आवेदित अखबारों पर निर्णय ले लिया होता तो जिन प्रकाशकों का अखबार इम्पैनल्ड नहीं होता उन प्रकाशकों के पास फरवरी 2011 में  दुबारा आवेदन का अवसर होता।
अखबार के प्रकाशक पहले ही जबरदस्त आर्थिक बोझ तले दबे होते हैं, परंतु डीएवीपी की मनमानियों की वजह से उन सभी प्रकाशकों पर छः महीने का अतिरिक्त भार पड़ गया है जिनका अखबार किसी भी कारण से इम्पैनल्ड होने से रह जाता।
तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि सरकार ने विज्ञापन नीति 2007 बनाते समय प्रकाशकों की धरातलीय समस्याओं को छुआ भी नहीं। सरकार के सामने लक्ष्य स्पष्ट है कि उन्हें अपना महिमागान और जरूरी संदेशों को अधिक से अधिक जनता तक पहुंचाना है। नई विज्ञापन नीति 2007 के अनुच्छेद दो में साफ लिखा है कि सरकार विज्ञापन पत्र पत्रिकाओं की आर्थिक सहायता करने के लिए जारी नहीं करती। यानी स्पष्ट है सरकार अपने संदेश के यथा संभव प्रचार के लिए वो अखबारों का इस्तेमाल कर रही है।
इस इस्तेमाल के लिए सरकार ने डीएवीपी को माध्यम बनाया है। कहने के लिए तो डीएवीपी सरकारी विज्ञापनों को अखबार में छपवाने के लिए एक रूट मात्र है लेकिन असल में डीएवीपी प्रकाशकों का भयादोहन कर रही है।
आज जरूरत है कि अखबार के प्रकाशक सरकार की उन नीतियों का विरोध करें जो अखबार को स्वतंत्र बनाए रखने में बाधक हों।
तरुणा एस. गौड़्

Wednesday, March 2, 2011

कमजोर नीति ने पैदा की पियक्क्ड़ो की फौज


बिहार के एक कस्बे में शराब विक्रेता ने एक व्यक्ति को मारकर लहूलुहान इसलिए कर  दिया क्योंकि उसने शराब विक्रेता को शराब बेचने से रोका था। हम इस घटना को उस समस्या से जोडकर देख  सकते है  जो लंबे समय से  बिहार के अलग -अलग इलाकों  मे देखने -सुनने को मिल रही है।  बेतहाशा बढ रहे शराब की दुकानों के खिलाफ महिलाओं ने अभियान-सा छेड दिया है। पुलिस एवं आबकारी विभाग से शिकायत करने के बावजूद राजधानी से कुछ ही दूरी पर स्थित बिहटा के पनाठी पंचायत की महिलाओं को अनवरत अभियान चलाने का निर्णय इसलिए लेना पडा क्योंकि पुलिस एवं आबकारी विभाग से शिकायत करने के बावजूद आज भी इन इलाकों में शराब के  निर्माण एवं बिक्री जारी है।
प्रदेश के विभिन्न इलाकों में जारी महिलाओं के इस अभियान में शराब की भट्ठी तोडने से लेकर धरना, प्रदर्शन आदि शामिल है। स्थिति यह है कि सरकार में शामिल जनप्रतिनिधियों को भी समय-समय पर अपने मुहल्ले में बेरोकटोक बिक्री की जानकारी देते हुए सरकार से उसे बन्द कराने हेतु गुहार लगाते रहना पडता है। मंत्री एवं अधिकारियों के जनता दरबार में जुटे फरियादियों में कुछ लोग नियम कानून को ताक पर रख कर शराब की भट्ठी खोलने की शिकायत करते हैं तो कई मुहल्ले में जगह-जगह शराब की बिक्री की शिकायत करते हैं। सामाजिक संगठनों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में शराबखोरी की वजह से कई लोग मौत की नींद सो गये। राज्य सरकार ने राजस्व वसूली के विचार से नयी आबकारी नीति-2007 लागू की तो सरकार के पास एकमात्र यही तर्क था कि नयी आबकारी नीति लागू होते ही अबैध शराब निर्माण पर रोक लग जाएगी, लेकिन हुआ उलटा। अवैध निर्माण पर तो रोक नहीं लगी, अलबत्ता जहरीली शराब से मौत का अंतहिन सिलसिला चल पडा है। आए दिन जहरीली शराब से मौत की घटनाएं एक नई समस्या के रूप में उभर रही है। पुलिस कागजी खानापूरी कर देती है और पुनः स्थिति यथावत रह जाती है। यह विडंबना ही कही जाएगी कि मीडिया जिस सरकार की उलब्धियों को को लेकर कसीदे तो गढती है उसी सरकार की  जनविरोधी नीति के प्रति चिन्ता क्यों नहीं प्रकट करती।

  बात शराब पीकर मरने की हो या फिर अनाज के बगैर हो, दोनों ही सूरत में मरते तो समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति ही है। इन गरीबों के लिए जरूरत सामाजिक व आर्थिक विकास की है। शराबखोरी से किसी भी व्यक्ति का सामाजिक व आर्थिक विकास  नहीं होता है, हां राज्य के खजाने जरूर भर जाते है। महिला संगठनों के अनुसार महिला एवं बच्चों के उपर चौतरफा दुष्प्रभाव पड रहा है। शराबखोरी के प्रचलन से सबसे अधिक महिलाओं को ही जूझना पडता है। जाहिर है शराबियों का कहर सबसे पहले अपनी पत्नियों के उपर ही तो टूटता है। शराब के नशे में पति, पत्नी को पीटता है। उसे होश ही नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है। कई बार नशे की हालत में ही दुर्घटना हो जाती है और परिवार बिखर जाता है। इस तरह तो सरकार समाज के सबसे पिछडे समुदाय की सामाजिक-आर्थिक रूप से सर्वाधिक पिछडी समझी जाने बाली महिलाओं का ही आर्थिक नुकसान कर रही है जिसने अमन चैन और खुशहाली के लिए प्रचंड बहुमत से एनडीए की सरकार को दुबारा सत्ता में लाया। शराबखोरी का सबसे अधिक दुष्प्रभाव भी उन्हीं लोगों पर पड रहा है जो किसी तरह मनरेगा से सौ-पचास रूपये कमाकर घर लौटता है, लेकिन घर पहुंचने के पहले  वह देशी शराब से अपने गले को तर कर लेता है। बीबी-बच्चों के लिए रोजमर्रे की चीजों के प्रबंध करने के बजाय वह खाली हाथ घर मदहोश होकर लौटता है।

शराबखोरी से उपजी आर्थिक बदहाली ने ही कभी गांधी को शराबबन्दी हेतु प्रेरित किया था। आजादी के बाद देश के बडे तबके को यह उम्मीद थी कि देश भर में शराब बंदी लागू कर दी जाएगी लेकिन इस मामले में तो बिहार सहित सभी राज्यों ने मानो अपनी आर्थिक निर्भरता शराब की बिक्री से और बढा ली है। तमाम राज्य सरकारें बाकायदा आबकारी नीति बनाती है जिसमें पियक्कडों, ठेकेदारों के हितों का ध्यान रखा जाता है । यह बुद्व, महावीर, गांधी, बिनोबा एवं जयप्रकाश नारायण के विचारों की ही हत्या ही मानी जाएगी। गांधी कहा करते थे कि जो शराब पीते है उनके बीबी, बच्चे सदा अभाव में जीने को मजबूर होते है। नयी नीति के लागू होने के करीब तीन-चार वर्षों में बिहार में शराब दुकानों की बेतहाशा वृद्वि हो गयी है। शराबखोरी  को बढावा मिला है। अब ग्रामीणों को निकट के बाजार में जाने के बजाय गांव में प्रयाप्त शराब मिल जाया करती है। लोग हैरान है कि कृषि एवं पशुपालन को बढावा देने के वायदे के साथ बनी नीतीश सरकार पूरे बिहार के गांव-गांव में शराब की दुकान खोलने की छूट क्यों दे रखी है। ग्रामीण अब मानने  लगे हैं कि  कृषि प्रधान बिहार में कृषि क्रांति, श्वेत क्रांति तथा नील क्रांति होने के बजाय यह क्या हो हो रहा है ? वे यह सोच कर परेशान हैं कि संपूर्ण क्रांति के नारों को जन्म देने बाले बिहार की धरती से  मदिराक्रांति का मानो आगाज हो रहा है। 
यह विरोधाभास ही कही जाएगी कि एक ओर जहां महिलाओं के सशक्तिकरण के नए-नए उपायों से संबंधित गतिविधियों को तेज करने पर बल दिया जा रहा है वहीं दूसरी ओर महिला घरेलू हिंसा एवं अपराध को बढावा देने में मददगार नयी आबकारी नीति को भी प्राथमिकता दी जा रही है। एक तरफ बाहुबलियों के अपराध पर नकेल डालने की कोषिश  हुर्हं तो दूसरी तरफ प्रदेश के गांवो में शराब पीने बालों की नयी फौज तैयार हो रही है । लोगबाग अब जगह-जगह बीयर या शराब की बोतले लिए खुले आम शराब पीने लगे हैं जिससे  महिलाओं को ही विषेश दुश्वारियों का सामना करना पडता है। शराब के दुकानों से होकर महिलाओं या स्कूल की छात्राओं का गुजरना दूभर हो गया है। अब तो प्रदेश के कई इलाकों के बस अड्डों, सडक मार्ग, तथा अन्य भीड भाड वाले इलाकों में दिन ढलते ही सरेआम शराब की बिक्री की जाती है। चलते-फिरते विक्रेता हॉकर की तरह शराब के पाउच, थैला आदि लिये रहते है। फेरी वाले शराब के पाउच से भरे बोरे अपने साईकिल पर टांगकर खेतों तक पहुंच जाते है। खेतों में काम कर रहे खेत मजदूर काम छोडकर खेतों के मेड पर ही सो जाते हैं। बिहार के कई ग्रामीण इलाकों का यही हाल है।

अब ग्रामीणों को निकट कें बाजार में जाने के बजाय गांव में पर्याप्त शराब मिल जाया करती है। शराब के अड्डों या शराब निर्माण वाले गांवों की महिलाएं अपने खेत, खलिहान एवं टोले में खुद को असुरक्षित समझती है। गांवों में पिछले तीन वर्षों में मदिरा पीने को लेकर अभूतपूर्व वृद्वि हुई है। ग्रामीणों के अनुसार गांवों में शराब बेचे जाने से गांव का माहौल खराब हो रहा है। गांव में अशांति फैल रही है। बेवजह तनाव बढ रहा है। नयी नीति के अनुसार 13 हजार 5 सौ की आबादी पर एक शराब की दुकान खोले जाने है।

जिस प्रदेश के गांवों में भुखमरी की पदचाप सुनाई पड रही हो वहां शराब आवाम के जीवन शैली का हिस्सा कैसे हो सकता है।  यह अलग बात है कि भुखमरी की खबरें अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री बार-बार केन्द्र से विषेश राज्य का दर्जा हासिल करते हुए एक करोड पैंतालिस लाख परिवारों के लिए खाद्यान्न की मांग करते रहे है । इस तरह प्रदेश में कुल गरीब लोंगों की संख्या सात करोड पचीस लाख हो जाती है । बिहार की तकरीबन ग्यारह करोड लोगों में लगभग छियासठ प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे रहने बाले लोगों के लिए शराब के बजाय रोजी-रोटी का प्रबंध समीचीन होता, लेकिन इन बातों से मानो सरकार को कोई सरोकार  नहीं रह गया हैं ।

बिहार में जब अनेक सामाजिक व राजनैतिक संगठनों ने एक स्वर से बेतहाशा बढ रहे शराब की दुकानों के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया तो मजबूरन बिहार सरकार को शिक्षण संस्थानों एवं मंदिर मस्जिद आदि के आसपास शराब की दुकानों को हटाने का निर्णय लेना पडा, लेकिन सरकार के इस नकली प्रयास से लोगों की  नाराजगी दूर नहीं हुई है, क्योंकि सरकार की इस घोषणा से आबकारी नीति की सेहत पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पडने बाला है, इससे न तो अवैध शराब के निर्माण पर रोक लगने बाली है और न ही ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की दुकानों की वृद्वि तथा न ही पीने बालों की संख्या रूकने बाली है। जनहित के प्रतिकूल होने के बावजूद यदि इस नीति को तवज्जो दी जा रही है तो इसके पीछे  मुख्यतः भारी राजस्व की प्राप्ति होना  है। इस संदर्भ में तेजी से विकास के लिए चर्चित बिहार अन्य राज्यों से अलग नहीं है। सवाल यह  है कि महज राजस्व में वृद्वि लिए समाज पर पडने बाले बुरे परिणामों की अनदेखी कैसे की जा सकती है।
राजीव कुमार